नैतिकता के मानकों को दिखाकर आमतौर पर स्त्री को अधिकारहीन बनाने की कोशिश की जाती है और उसे सार्वजनिक जीवन में अपनी स्वायत्त जगह बनाने से रोका जाता है।
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सामंतों को अधिकारहीन बनाए बिना भारत के किसानों और खेतमजदूरों का मजदूरों को समर्थन मिलना असंभव था क्योंकि बड़ी तादाद में खेतमजदूर सामंतों के खेतों में काम करते थे।
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नैतिकता के मानकों को दिखाकर आमतौर पर स्त्री को अधिकारहीन बनाने की कोशिश की जाती है और उसे सार्वजनिक जीवन में अपनी स्वायत्त जगह बनाने से रोका जाता है।
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स्वछंदतावाद ने नए विचारों के उद्भव में भी सहयोग दिया , और इस प्रक्रिया में उन सकारात्मक आवाजों का भी जन्म हुआ जो समाज के अधिकारहीन वर्ग के लिए हितकर थी.
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ब्राह्मणवादी संस्कृति ने दलित समाज को अपने में समाहित तो कर लिया परन्तु उसे पूर्णतः अधिकारहीन व अपवित्र करार देकर हाशिये पर ही पड़ा रहने के लिए मजबूर कर दिया .
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स्वदेशी जातीय धर्म पहले हर महाद्वीप में प्रचलित था , जिसे अब प्रमुख संगठित विचारधारा द्वारा अधिकारहीन कर दिया गया है लेकिन यह लोक धर्म की अंतर्धारा में अब भी मौजूद है.
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भले लोग जो अपमानित , राज्यभ्रष्ट , पराजित तथा अधिकारहीन करके निकाल दिये जाते हैं : “ ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः / ह्रताधिकारास्त्रिदशाभ्यां सर्वे निराकृताः ” , शक्ति उनके पक्ष में है।
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इस सन्दर्भ में प्रो . जगदीश्वर चतुर्वेदी लिखते हैं , “ पितृसत्तामक नज़रिए के कारण स्त्री क्रमशः अधिकारहीन हुयी , भोग की वस्तु बनी , इसी भोगवादी दृष्टि का साहित्य में भी जयघोष हुआ।
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“वैश्विक और अंतर्राष्ट्रीय पर कार्य करते हुए ये बैंक उन परियोजनाओं के माध्यम से लोगों के मानव अधिकारों को कमज़ोर समझते हैं , जिनका ग़रीबों और अधिकारहीन समुदाय के प्रति परिणाम अपर्याप्त और शोचनीय है.”
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यदि नामवरसिंह के अनुसार औरतों के पास पहले अधिकार थे तो बताएं वह कौन सा जमाना था जब अधिकार थे ? औरत अधिकारहीन थी , असमानता की शिकार थी , और आज भी है।