चदने और मजबूत पकड़ के लिए इनके पंजे भी बहुउपयोगी होते हैं [ 2] . इनमे से कई को अपने ह्रदय व् अंगों पर स्थित लोम के कारण स्पर्श का भी बहुत अच्छा इन्द्रियबोध होता है[1] .
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अन्य जानवरों में अलग इन्द्रियबोध होते हैं , जिसे की कुछ मछलियों में पानी के दबाव के लिए इन्द्रियाँ होती है जिनसे वे आराम से बता पाती हैं के आसपास कोई अन्य मछली हिल रही है के नहीं।
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सिर्फ़ शब्द और संवेदनायें ही कविता नहीं रच सकती , उसके भावावेग और अंतर्वस्तु में संतुलन के लिये गहरा जीवनानुभव और पका हुआ इन्द्रियबोध भी उतना ही जरूरी कारक है कविता को प्रभावी और आत्मीय बनाने के लिये।
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किताब में जिन डिमेंटर्स का वर्णन है उनमें द्र्श्येंद्रिय सक्रिय नहीं होती है बल्कि इसके स्थान पर उन्हें मानवीय निराशा का इन्द्रियबोध होता है , यह इन्द्रियबोध भी ऐसा होता है जो इन्विज़िबिलिती क्लोक से किसी प्रकार से प्रभावित नहीं होता.
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किताब में जिन डिमेंटर्स का वर्णन है उनमें द्र्श्येंद्रिय सक्रिय नहीं होती है बल्कि इसके स्थान पर उन्हें मानवीय निराशा का इन्द्रियबोध होता है , यह इन्द्रियबोध भी ऐसा होता है जो इन्विज़िबिलिती क्लोक से किसी प्रकार से प्रभावित नहीं होता.
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उनका संश्लिष् ट इन्द्रियबोध , गोचर-आगोचर वस् तु का पूर्ण चित्र प्रस् तुत करता है , उसकी गंध सूंघता है , ध् वनि संगीत का श्रवण करता है , शब् दों को सुनता है और उसे मूर्तिवत् ता प्रदान करता है।
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ऐसे छिछले अनुभव से बचने के लिये आवश्यक है कि हम दूसरों की भी अच्छी कविताओं पर गौर करें और अपने आस-पास घट रही छोटी-बड़ी चीजों के प्रति अपनी ज्ञानेन्द्रियाँ भी सजग रखें ताकि इन्द्रियबोध का बल हममें नित्य बढ़ता रहे।
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स्पष्ट है कि हमारे आस - पास जो भी घटित हो रहा है उसे जब कविता में हम लाते है तो इन्द्रियबोध के संवेगात्मक गति के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी ढंग उसके बिम्ब से पाठक की चेतना में प्रवेश पाते हैं।
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स्त्री के मन की यह घुमावदार गली उन तमाम तरह के दबावों का परिणाम है जिनका डर उसके इन्द्रियबोध तक पर पहरा देता है कि वह क्या सूँघ सकती है , क्या देख सकती है , क्या चख सकती है आदि।
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इसमें प्रखर इन्द्रियबोध का झलक भी मिलता है जो आपकी विकसित लोक-चेतन-दृष्टि को पाठकों के समक्ष आगे रखता है , पर आपकी रचना पर दक्षिण्पंथ की छाया भी एक हद तक विद्यमान रहता है जिससे निस्तार पाना एक सफल रचनाकार के लिये जरूरी है।