कालिदास की उपमाओं पर विचार करते हुए डॉ. शशिभूषण दास गुप्त कहते हैं कि, “जब हम कालिदास की उपमा की बात करते हैं, तब हम लोग केवल उनके उपमा-अलंकार के प्रयोग-नैपुण्य की ही बात नहीं करते हैं, उसकी एक विशेष प्रकार की अननुकरणीय सालंकार प्रकाश-भंगिमा की ही बात करते हैं।
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विडंबना यह है कि जब मौका पड़ता है, तो इन्हीं धर्मों की कुछ अननुकरणीय आदतों का अनुकरण करने से बाज नहीं आते और इस तरह सिद्ध करते हैं कि इस्लाम और ईसाइयत कुछ मामलों में हिन्दू धर्म से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि हिन्दू समाज आज भी उनसे कुछ सीख सकता है।
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विडंबना यह है कि जब मौका पड़ता है, तो इन्हीं धर्मों की कुछ अननुकरणीय आदतों का अनुकरण करने से बाज नहीं आते और इस तरह सिद्ध करते हैं कि इस्लाम और ईसाइयत कुछ मामलों में हिन्दू धर्म से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि हिन्दू समाज आज भी उनसे कुछ सीख सकता है।