जिस समय नियंडरथल मानव तथा अवमानव मध्य यूरेशिया में कठोर शीतलहरी से जूझ रहे थे, उस समय वि शुद्ध मानव ने किसी आश्रय-स्थान में शरीरिक गठन तथा अंगों के उपयोग में निपुणता प्राप्त की, अनुक पीढियों के अनुभवों से अपने जीवन को समृद्ध किया और मस्तिष्क की प्रतिभा का विकास किया।
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जिस समय नियंडरथल मानव तथा अवमानव मध् य यूरेशिया में कठोर शीतलहरी से जूझ रहे थे, उस समय वि शुद्ध मानव ने किसी आश्रय-स् थान में शरीरिक गठन तथा अंगों के उपयोग में निपुणता प्राप् त की, अनुक पीढियों के अनुभवों से अपने जीवन को समृद्ध किया और मस्तिष् क की प्रतिभा का विकास किया।