एक ध्रुव इलेक्ट्रान का निस्सारण करता है और दूसरा पहले ध्रुव की अपेक्षा धन विभव पर रखा जाता है, तब विद्युद्धारा प्रवाहित होती है।
12.
तापायनिक धारा तभी बह सकती है जब उत्सर्जक और उसको चारों ओर घेरे हुए बेलन की बीच धन विभव (पोटेंशियल) जारी रखा जाता है।
13.
यदि पट्टिका को ऋणाग्र की अपेक्षा धन विभव पर रखा जाय तो, जैसा ऊपर लिखा जा चुका है, इलेक्ट्रान धारा प्रवाहित हो जाती है।
14.
इस तृतीय ध्रुव की अनुपस्थिति में, जैसा पहले बताया जा चुका है, नली में तापायनिक धारा तभी प्रवाहित होती है जब धनाग्र ऋणाग्र की अपेक्षा धन विभव पर होता है।
15.
पर दो ही दिन पीछे उसका जी फिर दुखी रहने लगा, वह देवहूती का रूप जीवन देखती, उसके धन विभव की बात विचारती, और सोचती, क्या कोई दिन वह भी होगा, जिस दिन देवहूती का उजड़ा हुआ घर बसेगा? फिर सोचती, यह भी बावलापन है!
16.
जो साधु हो गया, वह घरबारी कैसे होगा!!! फिर जी में बात आती, तो भगवान ने इसको इतना रूप क्यों दिया! इतना धन विभव क्यों दिया!!! जो सदा उसको जलना ही है, तो यह रूप और धन विभव किस काम आवेगा! क्या देवहूती को विपत से उबारनेवाले देवस्वरूप उसकी इस बिपत से रच्छा करने का भी कोई उपाय सोचेंगे! देवस्वरूप का नाम मुँह पर आते ही वह चौंक उठी।
17.
जो साधु हो गया, वह घरबारी कैसे होगा!!! फिर जी में बात आती, तो भगवान ने इसको इतना रूप क्यों दिया! इतना धन विभव क्यों दिया!!! जो सदा उसको जलना ही है, तो यह रूप और धन विभव किस काम आवेगा! क्या देवहूती को विपत से उबारनेवाले देवस्वरूप उसकी इस बिपत से रच्छा करने का भी कोई उपाय सोचेंगे! देवस्वरूप का नाम मुँह पर आते ही वह चौंक उठी।