तत्कालीन समाज में व्याप्त रुढि मृतक भोज पर प्रेमचन्द कह गये हैं कि यह कैसी परम्परा है कि मरने के बाद परिवार के बचे हुए लोग मृतक भोज करवायें।
12.
मृतक भोज में उन्हें श्राद्ध के बाद सबसे अंत में बुलाया जाता था और भोज के बाद वे ही सबसे अधिक दान दक्षिणा आदि पाने के अधिकारी होते थे।
13.
जाति-पाँति पर आधारित ऊँच-नीच, मृतक भोज, भिक्षा व्यवसाय आदि और भी अनेक कुप्रचलन हैं, जिन्हें अगले ही दिनों दहेज के दानव की तरह परास्त करना होगा।
14.
समाज में एक बात यह भी देखने में आ रही है कि शादी समारोह हो या बूढ़े व्यक्ति का मृतक भोज, दोनों में कोई अंतर देखने में नहीं आता।
15.
अर्थी, लकड़ी, घी आदि का मूल्य करीब अढाई हजार, गौदान के निमित्त पांच हजार और मृतक भोज के लिए कम से कम तीन हजार का खर्च है.
16.
दहेज, मृतक भोज, सदावर्त, धर्मशाला आदि ऐसे दान जो मात्र प्रसन्न करने भर के लिए दिये जाते हैं और उस उदारता के लाभ समर्थ लोग उठाते हैं-अनुपयुक्त माने और रोके जायें।
17.
बिरादरी के सरगने विधवा पत्नी के पास बचे आभूषण और मकान के बलबूते पर ही सही मगर वह मृतक के परिवार से हर हाल में मृतक भोज चाहते हैं क्योंकि यह उनके नाक के कट जाने जैसा है।
18.
बिरादरी के सरगने विधवा पत्नी के पास बचे आभूषण और मकान के बलबूते पर ही सही मगर वह मृतक के परिवार से हर हाल में मृतक भोज चाहते हैं क्योंकि यह उनके नाक के कट जाने जैसा है।
19.
मृतक भोज के पीछे भी यही आदर्शवादिता थी कि पिता के द्वारा उत्तराधिकार में मिले हुए धन को लड़के अपने काम में नहीं लेते थे, वरन् समाजसेवी ब्राह्मणों के निर्वाह में या अन्य पुण्यकार्यों में खर्च कर डालते थे ।
20.
मृतक भोज के पीछे भी यही आदर्शवादिता थी कि पिता के द्वारा उत्तराधिकार में मिले हुए धन को लड़के अपने काम में नहीं लेते थे, वरन् समाजसेवी ब्राह्मणों के निर्वाह में या अन्य पुण्यकार्यों में खर्च कर डालते थे ।