तमाम चैनल्स और अख्बारों के दफ़्तरों मे बैठ कर अहो रूपम् अहो ध्वनि का वृन्दगान करने वाले तथाकथित एक्स्पर्ट्स की भीड़ के बीच आपकी आवाज बहुत विश्चास जगाने वाली महसूस होती है..
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ओ दीर्घकाय! ओ पूरे झारखंड के अग्रज, तात, सखा, गुरु, आश्रय, त्राता महच्छाय, ओ व्याकुल मुखरित वन-ध्वनियों के वृन्दगान के मूर्त रूप, मैं तुझे सुनूँ, देखूँ, ध्याऊँ अनिमेष, स्तब्ध, संयत, संयुत, निर्वाक: कहाँ साहस पाऊँ छू सकूँ तुझे! तेरी काया को छेद, बाँध कर रची गयी वीणा को