जहाँ यह मानना होगा कि कवि का कल्पना-लोक इतना संकुचित और दृष्टि इतनी दोषपूर्ण हो सकती है!
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इस धारा ने कविता को कल्पना-लोक से निकाल कर जीवन के वास्तविक धरातल पर खड़ा करने का प्रयत्न किया।
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शाम को पैदल भटकते लौटते हुए दुर्गा पूजा की रौनक और धूम से शहर कल्पना-लोक में बदल गया लग रहा है।
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शाम को पैदल भटकते लौटते हुए दुर्गा पूजा की रौनक और धूम से शहर कल्पना-लोक में बदल गया लग रहा है।
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जीवन की इस विषमता के रहते, प्रकृति के कल्पना-लोक में विचरने का किसे अवकाश है?-कहाँ मनुज को अवसर देखे मधुर प्रकृति-मुख?
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रचना-विफलता का रात का किस्सा सुन उन्होंने ठिठोली की, ‘‘... मित्र, कल्पना-लोक में विचरने के मजे आप खूब लूटते हैं...
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सफल लेखक बीज रूप में प्राप्त छोटे से सूत्र स े, अपनी कल्पना-लोक के आधार पर ऐसा वृहद संसार रच लेता ह ै, जो वास्तविकता का आभास देता है।
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इस तरह के कथन से मालूम हो जाता है कि कविता एक गैरजरूरी संवाद और मजाकिया लहजे के साथ लगातार कल्पना-लोक में विचरण करने की मंशा से भरी है.
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आलोचकों का बड़ा पुराना आरोप है कि जिस समय देश में स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष हो रहा था, छायावादी कवि कल्पना-लोक में बैठकर हृत्तन्त्री के तार बजाया करते थे।
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इस तरह के कथन से मालूम हो जाता है कि कविता एक गैरजरूरी संवाद और मजाकिया लहजे के साथ लगातार कल्पना-लोक में विचरण करने की मंशा से भरी है.