हमारी छन्दोरचना तक की कोई कोई अवहेलना करते हैं-वह छन्दो रचना जिसके माधुर्य को भूमण्डल के किसी देश का छन्द शास्त्र नहीं पा सकता और जो हमारी श्रुति-सुखदता के स्वाभाविक प्रेम के सर्वथा अनुकूल है।
22.
आवाज या वाणी में पैरालैग्वेज नामक अशाब्दिक तत्व सम्मिलित होते हैं जिनमें आवाज की गुणवत्ता, भावना, बोलने के तरीके के साथ-साथ ताल, लय, आलाप एवं तनाव जैसे छन्द शास्त्र संबंधी लक्षण भी सम्मिलित हैं.
23.
वेद रूप पुरुष के मुख्य छ: अंगों में व्याकरणशास्त्र वेद का मुख ज्योतिष शास्त्र दोनो नेत्र निरुक्त दोनो कान कल्प शास्त्र दोनो हाथ शिक्षा शास्त्र वेद की नासिका और छन्द शास्त्र वेद पुरुष के दोनो पैर कहे गये हैं।
24.
वेद रूप पुरुष के मुख्य छ: अंगों में व्याकरणशास्त्र वेद का मुख ज्योतिष शास्त्र दोनो नेत्र निरुक्त दोनो कान कल्प शास्त्र दोनो हाथ शिक्षा शास्त्र वेद की नासिका और छन्द शास्त्र वेद पुरुष के दोनो पैर कहे गये हैं।
25.
5 नवंबर 1936 को हरियाणा के गुरुग्राम ज़िले के रणसीका ग्राम में जन्मे ओमप्रकाश ‘ आदित्य ' हिन्दी की वाचिक परंपरा में हास्य के शिखर पुरुष होने के साथ-साथ छन्द शास्त्र तथा काव्य की गहनतम संवेदना के पारखी कहे जाते थे।
26.
इस संस्करण में ग्रंथ का परिचय इस प्रकार दिया गया है-' छन्दःप्रभाकर' अर्थात भाषा पिंगल, सूत्र और गूढ़ार्थ सहित जिसमें छन्द शास्त्र की विशेष ज्ञानोत्पत्ति के लिए मात्राप्रस्तार, वर्णप्रस्तार, मेरु, मर्कटी, पताका प्रकरण, मात्रिकसम, अर्द्धसम, विषम और वर्णसम, अर्द्धसम और विषम वृत्त प्रकरणों का वर्णन बड़ी विचित्र और सरल रीति से लक्षण और उत्तम उदाहरणों सहित दिया है।
27.
प्रथम कल्प-24 वर्ष तक ब्रहमचर्य पालन करने वाले के लिए-अर्थात 8 वर्ष की आयु में पठन पाठन आरंभ कर 16 वर्ष में तक निरन्तर व्याकरण में महाभाष्य पर्यन्त, निरुक्त, सामान्य कोष, छन्द शास्त्र साहित्य, ज्योतिष शास्त्र, कल्प सूत्र, धर्म सूत्र, उपनिषद् तथा एक वेद का अध्ययन हो सकता हैं।
28.
काव्य साधना न व्यर्थ है कभी सदैव जान ये मनुष्य को सदा मनुष्यता सिखाती है शारदा कृपा विशेष हो तभी मिले कवित्व छन्दसिद्धि देवतुल्य आज भी बनाती है दीन या निराश चित्त में यही भरे उमंग और अंग अंग मध्य चेतना जगाती है छन्द शास्त्र ज्ञान युक्त जो हुआ प्रवीण मित्र ये विधा महान मोक्ष भी उसे दिलाती है रचनाकार डॉ आशुतोष वाजपेयी ज्योतिषाचार्य लखनऊ
29.
इस प्रकार निश्चय ही अगीत, अगीत के प्रवर्तक डा. सत्य व अगणित रचनाकार, समीक्षक व रचनायें, निराला-युग से आगे, हिन्दी, हिन्दी सा्हित्य, व छन्द शास्त्र के विकास की अग्रगामी ध्वज व पताकायें हैं, जिसे अन्य धारायें, यहां तक कि मुख्य धारा गीति-छन्द विधा भी नहीं उठा पाई ; अगीत ने यह कर दिखाया है, और इसके लिये कृत-संकल्प है।