मैं जब छोटी थी जोर जोर से गाना गाती, मटक-मटककर नक़ल उतारा करती-ऐसा मेरे बाबा कहते थे | यह किस्सा उन दिनों का है जब मैं कक्षा तीन में पढ़ा करती थी | आर्य कन्या पाठशाला में हर शनिवार बच्चे कविता पाठ और नाटक में भाग लेते थे | एक शनिवार बाल लीला का आयोजन हुआ | उसमें मैं कृष्ण बनी | पीत वस्त्र धारण कर फूलों के गहनों में मैं सचमुच कन्हैया लग रही थी |
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इस पीढ़ी ने तो मानो सारे निर्देशों, सलाह और सुझावों को रद्दी की टोकरी में डालने का फैसला कर रखा है तभी तो मेट्रो की बार-बार समझाइश के बाद भी वे ट्रेन के फर्श पर बैठकर मनमानी करते हैं, मेट्रो में प्रतिबन्ध के बाद भी जमकर एक दूसरे के फोटो खींचते हैं, वीडियो बनाते हैं, जोर से गाना सुनते-सुनाते हैं भले ही आस-पास के लोग परेशान हो जाएँ और अब तो उनके कुछ कारनामे न्यूज़ चैनलों और अश्लील वेबसाइटों तक पर सुर्ख़ियों में हैं.