“ कर्मकाण्डप्रदीप ' के अनुसार बालक का पिता प्रातः कालीन स्नान संध्या से निवृत्त होकर पूर्वांग पूजा के निमित्त संकल्प लेकर गणेशपूजन, गौर्यादि षोडश मातृका पूजन, नान्दीश्राद्ध, पुण्याहवाचन करके कलशस्थापन पूर्वक नवग्रहपूजन करे।
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इस प्रकार धर्मप्राप्ति के साधनों को जानकर अनुष्ठान के लिए पौर्वापर्य का भी ज्ञान अपेक्षित है एवं फल के लिए अनुष्ठेय अग्नि होत्रादि कर्मों के प्रकरण में पूर्वांग और उत्तरांग साधनों का भी विवेचन है, जिनके लिए “प्रकृति” शब्द का प्रयोग होता है।
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इस प्रकार धर्मप्राप्ति के साधनों को जानकर अनुष्ठान के लिए पौर्वापर्य का भी ज्ञान अपेक्षित है एवं फल के लिए अनुष्ठेय अग्नि होत्रादि कर्मों के प्रकरण में पूर्वांग और उत्तरांग साधनों का भी विवेचन है, जिनके लिए “प्रकृति” शब्द का प्रयोग होता है।
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इस प्रकार धर्मप्राप्ति के साधनों को जानकर अनुष्ठान के लिए पौर्वापर्य का भी ज्ञान अपेक्षित है एवं फल के लिए अनुष्ठेय अग्नि होत्रादि कर्मों के प्रकरण में पूर्वांग और उत्तरांग साधनों का भी विवेचन है, जिनके लिए “ प्रकृति ” शब्द का प्रयोग होता है।
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जिन रागों का वादी स्वर जब सप्तक के पूर्वांग अर्थात् ‘सा, रे, ग, म', इन स्वरों में से होता है, तो वे ‘पूर्वांगवादी राग' कहे जाते है, तथा जिन रागों का वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग अर्थात् ‘प, ध, नि, सां', इन स्वरों में से होता है, वे ‘उत्तरांगवादी राग' कहे जाते है।
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यहाँ उस्ताद खाँ साहब के ‘आलाप ' को प्रक्रियागत एवम् संरचना के बारे में स्पष्ट है कि वे बहुत ही नैसर्गिकता के साथ अपनी पाटदार आवाज से स्थायी में पहले 'षड्ज' लगा कर वादी स्वर का ऐसा महत्व दिखा देते थे कि पूर्वांग में ‘राग‘ चलता और आरंभ में कुछ मुख्य-स्वर समुदायों को लेकर फिर एक नया स्वर अपने स्वर-समुदायों में जोड़ जोड़कर वे मध्य-स्थान के पंचम 'धैवत' और ‘निषाद' तक जाते हैं फिर ‘तार-षड्ज' को बहुत खूबसूरती से छूते हुए 'मध्य-षड्ज' पर 'स्थायी' समाप्त करते।