निंदा करना, आलोचना करना, भर्त्सना करना, पोल खोलना, सच्चाई सामने लाना दूसरी बात है, पर किसी भी आदमी को खुलेआम गाली देना, ये कहाँ की रीति है, कहाँ की अच्छाई है, किस रूप में अच्छा है.
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प्रत्येक बुराई की पराकाष्ठा से पहले प्रारम्भ में ही उसके निदान की बात होनी चाहिए | पूनम पाण्डेय की ऐसी मानसिकता किन परिस्थितियों में बनी होगी, इस पर विचार होना चाहिए | भर्त्सना करना तो सदैव आसान रहा है पर पुनरावृत्ति रोकना सदैव मुश्किल |
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फिर यदि किसी व्यक्ति ने उस क़ानून की मदद की और सच्ची गवाही दी तो उस खास कार्य को सिरे से नकार देना, उसकी तीखी भर्त्सना करना और उसे देशद्रोह करार देना बाहरी तौर पर आकर्षक तो लगता है पर उचित हो यदि हम इसे अपनी पूर्णता में देखें.
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मैं तो मात्र यह कह रहा हूँ कि वे कैसे भी आदमी रहे हों पर यदि वे सच में एसेम्बली में घटना के समय मौजूद थे और उन्होंने इसकी गवाही कोर्ट में दी तो इस कार्य के लिए उनकी निंदा और भर्त्सना करना अपने आप बहुत उचित प्रतीत नहीं होता है.
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कौशिक जी थोथली बडाई या भर्त्सना करना मेरी आदत नहीं आज कल कमेन्ट करने की यही परिभाषा हो गयी है कविता पढ़ी या नहीं बस कहना यही है क्या बात है बहुत सुंदर लिखा है बड़ा भाव प्रधान रचना है अरे भाव है तो डूबो न भाब मेंमें डूबो फिर लिखो कुछ..
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सबसे पहले तो मैं आयुर्वेद के उन छद्मचिकित्सकों की भरपूर भर्त्सना करना चाहता हूं जो अपनी बेवकूफ़ी के कारण रोगी के प्राण ले लेते हैं और अंधेरे में तीर चलाते हुए आयुर्वेद को बदनाम करते हैं, बाबा रामदेव महाराज का नाम बिक रहा है आयुर्वेद की मिट्टी पलीद हो रही है उनके नाम पर।
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अच्छी बात है, जो शिक्षक हमें एक सफल सामाजिक प्राणी बनाने के लिए अपनी रचनात्मक भूमिका निभाकर एक महान कार्य करता है, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित करना एक सुशिक्षित व्यक्ति के लिए लाज़मी है और दूसरी और इस महती सामाजिक कार्य की जिम्मेदारी उठाने वाली महत्वपूर्ण इकाई के प्रति सरकार के असंवेदनशील रुख की भर्त्सना करना भी उतना ही ज़रूरी है।
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प्रह्लाद का पिता की आज्ञा का उल्लंघन करना, बलि का गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा न मानना, विभीषण का भाई को त्यागना, भरत का माता की भर्त्सना करना, गोपियों का पर पुरुष श्रीकृष्ण से प्रेम करना, मीरा का अपने पति को त्याग देना, परशुराम जी का अपनी माता का सिर काट देना आदि कार्य साधारणत: अधर्म प्रतीत होते हैं, पर उन्हें कर्ताओं ने सदुद्देश्य से प्रेरित होकर किया था, इसलिये धर्म की सूक्ष्म दृष्टि से यह कार्य पातक नहीं गिन गये।
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मात्र २ ० किलोमीटर की दूरी पर संजय गाँधी जैसा स्नातकोत्तर संसथान और लखनऊ में लगभग दस सरकारी और प्राइवेट कोलेजो और किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के होते हुए भी रायबरेली जैसी जगह में एम्स खोलना राजनैतिक चाटुकारिता, निकृष्ट हठधर्मिता और उत्तर प्रदेश की जनता खासकर पूर्वी उतरप्रदेश या पूर्वांचल की जरूरतों और जनाकाक्षाओं पर धृष्ट कुठाराघात है I इस कदम का हर प्रकार से विरोध होना चाहिए और हम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के कोंग्रेस सरकार के इस मनमाने निर्णय के समर्थन की भर्त्सना करना चाहते हैं!