शब्दचयन में माधुरी एवं अर्थव्यक्ति की ओर कवि ने सविशेष ध्यान दिया है, जिससे आवंती एवं वैदर्भी रीति का निर्वाह पूर्ण रूप से हुआ है।
22.
उभय प्रकार के रूपकों में भरत द्वारा सविशेष महत्व के दस रूप माने गए हैं जो दशरूप के नाम से संस्कृत नाट्यपरंपरा में प्रसिद्ध हैं।
23.
ध्यान योग: १ सालंब (सविशेष) / २. निरालम्ब (निर्विशेष) सालंब: सगुन साकार विग्रह नारायण का दर्शन सालंब है.
24.
दो बातें अाज-कल सभी पालक सोचते हैं कि नाम छोटा हो, और नया हो! पर इनसे अतिरिक्त सविशेष बातों की ओर दुर्लक्ष होता बहुधा दिखायी देता है ।
25.
जैसे कि ब्रह्म, ओम, ईश्वर, वेद, वेदांत, परमेश्वर इत्यादि; या फिर वैसे शब्द जो की पदवी वाचक हैं, जिन्हें केवल कुछ सविशेष परिश्रम से ही कमाया जाना चाहिए उदा.
26.
‘‘ कबीर का सौन्दर्य ब्रह्म सविशेष ब्रह्म है, इससे उनके अन्तःकरण में भगवान का प्रेम जागा तो कबीर ने कहा, ” संतो भाई आई ज्ञान की आंधी रे।
27.
दो बातें अाज-कल सभी पालक सोचते हैं कि नाम छोटा हो, और नया हो! पर इनसे अतिरिक्त सविशेष बातों की ओर दुर्लक्ष होता बहुधा दिखायी देता है ।
28.
इस कठोर व्रत में अनुष्ठान का सांगोपांग पालन करने के साथ-ही-साथ जिस तथ्य को सविशेष रेखांकित किया गया है, वह है किसी भी व्रत की अनिवार्यतः पालन करने योग्य भूमिका।
29.
बाद को विवाद होगा, तब तक यह आवश्यक कार्य पूरा कीजिए तैल-पूर्ण पात्र यह लेकर प्रदक्षिणा कर आइए भूमंडल की ध्यान रहे सविशेष एक बूँद भी इससे तेल न गिरने पाए।”
30.
श्रौत ज्ञान के मोक्षसाधन होने पर भी श्रुतियों का द्वैत में अथवा अद्वैत में, सविशेष या निर्विशेष आत्मा में या अनात्मा में तात्पर्य है, इस प्रकार परीक्षणरूप चौथा विचार है।