दु: खद है विश्व के एक जानेमाने अर्थ शास्त्री के प्रधान मंत्री रहते हुए अर्थ से जुड़े मुद्दे में उसका अपने ही देश के सामने असफ़ल सिद्ध होना ।
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मंदी के असर से अच्छा खासा अर्थ शास्त्री कवि बन गया वो भी बच्चन दिनकर से भी ऊंचा इस से बढ़ कर मंदी में बुरी बात और क्या होगी...
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नोबल शांति पुरस्कार विजेता और ग्रामीण बैंक के संस्थापक सुपरिचित बांगलादेशी अर्थ शास्त्री मुहम्मद यूनुस की सद्य प्रकाशित किताब क्रिएटिंग अ वर्ल्ड विदाउट पॉवर्टी एक अभिनव अवधारणा प्रस्तुत करती है.
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इस साल का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अमरीका की अर्थ शास्त्री, एलिनोर ओस्ट्रॉम को उन्हीं के देश के ओलिवर विलियम्सन के साथ साझा रूप में दिया गया है.
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अर्थ शास्त्री एनके चौधरी कहते हैं जब पूरी व्यस्था या घर के कर्ताधर्ता ही नाकारा हों और खर्च करने की कोई व्यवस्था ही न हो तो पैसे कैसे खर्च होंगे.
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केवल नारों से काम नहीं चलता, हमारे तो प्रधान मंत्री भी एक अर्थ शास्त्री है, उन्हें तो इस समस्या को भली भांति समझना और दूर करने के लिए कठोर कदम उठाना चाहिए.
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असल में समस्या है मंशा की, क्या अमरीका से पढ़ के आये ये (अन) अर्थ शास्त्री भारत के 6.5 लाख गांवों में बसे कोटि-कोटि जन-गण-मन की समस्या को समझ पाएंगे..
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(अर्थ शास्त्री याने जिस के शास्त्र का कोई अर्थ न हो, अब आप ही बताईये जब इन्फ्लेशन पाँच प्रतिशत था तब कौनसी दाल आप को मुफ्त में मिल रही थी?.) नीरज
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मान्टेक सिंह आहलूवालिया जैसे तथा कथित अर्थ शास्त्री और प्रधान मंत्री के वित्त सलाहकार कहे जाने वाले मेधावी वित्त प्रबंधक के नेतृत्वा में भारतीय आर्थ प्रणाली की इस तरह की विडम्बना-पूर्ण व्याख्या बहुत हीआक्रोशजनक है।
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मान्टेक सिंह आहलूवालिया जैसे तथा कथित अर्थ शास्त्री और प्रधान मंत्री के वित्त सलाहकार कहे जाने वाले मेधावी वित्त प्रबंधक के नेतृत्वा में भारतीय आर्थ प्रणाली की इस तरह की विडम्बना-पूर्ण व्याख्या बहुत हीआक्रोशजनक है।