उन्हों ने इस अवसर पर जन कवि महेन्द्र नेह के कविता संग्रह “ थिरक उठेगी धरती ” का लोकार्पण करते हुए कहा कि महेन्द्र की ये कविताऐं व्यवस्था की जकड़बंदी के विरूद्ध प्रतिरोध जगाती हैं और जन गण के आशामय भविष्य की ओर संकेत करती हैं।
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पर्वतों की चोटियां रक्तिम स्वर्ण हो गयीं किसी तप्त लालसा से नहीं, प्यार की पहली लजीली मुस्कराहट से, जो आशामय दिव्याभा की नवागता किरण थी | सुबह के होते ही पक्षियों ने स्वागत गीत गाये, पशुओं ने प्रसन्न नेत्रों से निहारा, पत्थर सम्मान के लिए जगमगा उठे, झाड़ियों, वृक्षों तथा अन्यत्र धरती में हरीतिमा का उल्लास छा गया.