जरुरी है समाज के मुद्दों पर पर कदमताल करना, अतः जागे, उठे और शर्मीला की ताकत बनें खुद की न सोचकर देश, समाज की सोचे आज स्थिति यह है की लोग संगमरमर हुए / ह्रदय हुए इस्पात वर्फ हुई संवेदना ख़तम हुई सब बात।
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खैर, हम बात कर रहे थे कि बदलते समय के साथ इस आदमी ने कदमताल करना सीख लिया था और अपनी शिक्षाविद तथा आध्यात्मिक छवि को चमकाने के लिए अब इसके पास एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी था यानि कि एक चैनल जिससे कि वह अपनी बात औरों तक पहुंचा सके।
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-दिलीप चेरिय न अब से पाँच साल पहले तक भारत में पीआर के बारे में लोग ज्यादा कुछ जानते नहीं थे, लेकिन जब से भारतीय अर्थव्यवस्था ने करवट बदली और इसने कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की खोल उतारकर बाजारोन्मुखी अर्थव्यवस्था का जामा पहना और वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ कदमताल करना आरंभ किया, पीआर का क्षेत्र अचानक विकास की सीढ़ियों पर छलाँगें लगाने लगा।
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आज हमें सर्वथा नए दृष्टिकोण से सोचना होगा और समय की नब्ज को टटोलकर उसके मर्ज का जायजा लेने की कसमसाहट को अपने अंतस में महसूसना होगा तभी हम एक बेहतर कल युवा पीढ़ी को सौंप पाएंगे, वर्तमान समय की परिक्रमा करते हुए हमें उसके साथ निर्ममता से कदमताल करना होगा तभी इस बेढंग और निर्मम समय का नंगा सच अपनी खाल को उतारकर हमारे सम्मुख मेमना बन पायेगा ।