फिर आज दोबारा घर लौट कर जाना है डिस्टेम्पर पर फीके पड़ते लिखे नाम पहचानने हैं........... थोड़ा सा बचपन का जादू बाँध संग ले आना है बहुत अकेलेपन में सुनने को पापा की लोरी लानी है.......
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उसमें महंगा डिस्टेम्पर जो पुता था, बड़ा ख़ूबसूरत लड़कियां ================================================================================ Sanjay Dubey on 22/05/08 05:55:00 खूबसूरत लड़कियां नहीं मिलतीं आसानी से होती हैं कई प्रतियोगिताएं मिस सिटी से मिस यूनिवर्स तक अब मिसेज भी होने लगी हैं इसके बावजूद नहीं
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ढ़हने को व्याकुल खण्डहरों पर डिस्टेम्पर करना होगा काले तन तन मन को फिर सतरंगी वस्त्रों से ढकना होगा जल कर राख हो गए कभी के बुझे दिल से फिर दिप जलाने होंगे हमने खाए हजारों गम आज गम उन्हीं गेरो को गेवर खिलाने होंगे।
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उसमें महंगा डिस्टेम्पर जो पुता था, बड़ा सा दीवान था, सोफा, टीवी, एक मेज और कुछ कुसियां भी, आधुनिक युग में आदिम कहे जा रहे जनों की कलाकृतियां भी, दरवाजे पर भी नक्काशी, बहन की बनाई लाल गुलाबों वाली पेंटिंग भी, और दरवाजे पर लटकता चीनी खिलौना विंड चाइम/चैम।
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उसमें महंगा डिस्टेम्पर जो पुता था, बड़ा सा दीवान था, सोफा, टीवी, एक मेज और कुछ कुसियां भी, आधुनिक युग में आदिम कहे जा रहे जनों की कलाकृतियां भी, दरवाजे पर भी नक्काशी, बहन की बनाई लाल गुलाबों वाली पेंटिंग भी, और दरवाजे पर लटकता चीनी खिलौना विंड चाइम/चैम।
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इसके अलावा, अब तो भारत में पंचगव्य के उपयोग से फिनायल, अन्न सुरक्षा टिकिया, मच्छर निरोधक क्वायल, बर्तन मांजने का पाउडर, डिस्टेम्पर, फेस पैक (उबटन), साबुन, सैम्पू, तेल, धूप बत्ती, दंत मंजन आदि कई चीजों का निर्माण व्यावसायिक स्तर पर किया जा रहा है।
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तुम पीछा करते हो चिप्स बिछी फर्श के किनारे-किनारे डिस्टेम्पर पुती दीवारों के साथ-साथ टीक के दरवाज़ों की झिर्रियों में से बाहर निकलती मार्बल की सीढ़ियों पर, राहदरी में गैराज के शटर के साथ-साथ लोहे के जंगलों के पार, कोलतार की सड़कों और धूल भरी पगडंडियों से होते हुए जाने कहाँ तक चली गई है कतार!
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उसमें महंगा डिस्टेम्पर जो पुता था, बड़ा सा दीवान था, सोफा, टीवी, एक मेज और कुछ कुसियां भी, आधुनिक युग में आदिम कहे जा रहे जनों की कलाकृतियां भी, दरवाजे पर भी नक्काशी, बहन की बनाई लाल गुलाबों वाली पेंटिंग भी, और दरवाजे पर लटकता चीनी खिलौना विंड चाइम / चैम।
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< / p><p align=“center”>उसमें महंगा डिस्टेम्पर जो पुता था,< /p><p align=“center”>बड़ा सा दीवान था, सोफा, टीवी, एक मेज और कुछ कुसियां भी,< /p><p align=“center”>आधुनिक युग में आदिम कहे जा रहे जनों की कलाकृतियां भी,< /p><p align=“center”>दरवाजे पर भी नक्काशी, बहन की बनाई लाल गुलाबों वाली पेंटिंग भी,< /p><p align=“center”>और दरवाजे पर लटकता चीनी खिलौना विंड चाइम/चैम।< /p><p align=“center”>ऐसा नहीं कि यह कमरा ही दूसरों से ईर्ष्या करता था, बल्कि इसके अंदर की चीजें भी एक दूसरे से।
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बड़े अरमानों से, खुद को सजाया हर डिस्टेम्पर, खुद पर आजमाया, न जाने कितनी साडियां, खुद पर निसार की तब कहीं जाकर, एक पर दिल आया झुमके बालिओं की हर खेप से मुखातिब हुई कितने नेकलसों को, फिर गले लगाया मैंचिंग के गुरों की, हर पोथी पढ़ डाली फैशन का कोई ज्ञान, न किया मैंने जाया बार बार आईने से, भिड़ती रही थी, इस साजो श्रृगार में, पूरे तीन घंटे लगाया टोरंटो की सड़कों पर, बिजली गिराने का मैंने प्रोग्राम और इरादा बनाया