बहुत बिस्मयकारी तथ्य यह है क़ि एक आध पाखंडियो के कुत्सित क्रिया कलाप के आधार पर समस्त मंदिरों एवं वेद शास्त्र का ज्ञान रखने वाले पंडितो को दोष युक्त कैसे कह दिया जाता है?
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भगवान् बुद्ध ने कहा है-यदि कोई दोष युक्त मन से बोलता है या कर्म करता है तो दुःख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाडी का चक्का खीचने वाले बैलों के पैर का।
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दोष युक्त जमीन का प्रभाव देवी पुराण में कहा गया है कि गृह निर्माण कार्य शुरू करने पर मकान बनवाने वाले व्यक्ति के शरीर में खुजाहट होने पर समझना चाहिए कि जमीन वास्तुदोष से पीड़ित है।
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गीता-18. 48अतः दोष युक्त कर्म होने पर भी सहज कर्मों को करते रहना चाहिए क्योंकि-कर्म के बिना नैष्कर्म्य की सिद्धि नहीं मिलतीनैष्कर्म्य कि सिद्धि ही ज्ञान योग की परा निष्ठा है गीता-18.
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दोष युक्त जमीन का प्रभाव देवी पुराण में कहा गया है कि गृह निर्माण कार्य शुरू करने पर मकान बनवाने वाले व्यक्ति के शरीर में खुजाहट होने पर समझना चाहिए कि जमीन वास्तुदोष से पीड़ित है।
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सभी कर्म दोष युक्त होते हैं [सूत्र-18.48] लेकीन नियत कर्मों को करते रहना चाहिए और इनके करनें में कर्म-बंधनों के प्रति होश बनाना ही, कर्म-योग होता है ॥
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कालसर्प योग की अवधि काल सर्प दोष युक्त कुंडलियों में कुछ शुभ योग साथ होने से जैसे पंच महापुरुष योग, बुधादित्य योग आदि होने से इनका प्रभाव कुछ अवधि या गोचर व दशा के कारण कुछ समय अधिक प्रभावी होता है।
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उन्हें पढ़ने वाला राधा कृष्ण के सम्बन्ध में कभी भी दोष युक्त द्रष्टि का शिकार नहीं हो सक ता, वास्तव में रास लीला अप्राकृत लीला थी, जहाँप्रत्येक वस्तुऔर तत्व अप्राकृत जहाँ भौतिक म्लान काम आदि का स्पर्श भी नहीं है!
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अरे भाई! जगत में अत्यंत पौष्टिक और अत्यंत स्वादिष्ट अनेकों पदार्थ हें जो कि निर्दोष खाद्य हें, तब फिर ऐसी किसी विशेष वस्तु के प्रति ही इतना तीव्र आग्रह क्यों, जो दोष युक्त है और स्थापित लोक मान्यताओं के विरुद्ध भी?
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पिता के स्थान-दशम् भाव का स्वामी 6, 8, 12 वें भाव में चला जाए एवं गुरु पापी ग्रह प्रभावित या राशि में हो साथ ही लग्न व पंचम के स्वामी पाप ग्रहों से युति करे तो ऐसी कुंडली पितृशाप दोष युक्त कहलाती है।