यहां तक कि अपने सामने जो कोई पड गया उसको निर्दयता से गोली मार देने वाला पकिस्तानी अज़मल कसाब भी अब धृष्टता से अपने जीने के “ हक ” की मांग कर रहा है.
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श्री चरणों के प्रति इनकी इस धृष्टता से आश्रम के सभी लोगों को महान् क्षोभ है और महाराज जी से अब हम जानना चाहते है कि इनके साथ हम लोगों का कैसा व्यवहार हो? ”
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औषधीय जड़ी बूटियाँ समृद्ध कैसे होगी? दुनिया कैसे चलेगी? भगवान ब्रह्मा ने कहा, “ चंद्रमा की धृष्टता से भगवान गणेश नाराज है | ” देवताओं ने भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा की ।
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) का ऐसा ही बेहद शर्मनाक और बेशर्मीभरा समाचार पढा जिसमें एक महिला (उसके पति ने भी) अपने साथ हुए दुराचार की शिकायत की तो एस. पी. ने धृष्टता से कहा कि इतनी पुरानी महिला से कौन दुष्कर्म करेगा ।
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मैं निर्लज्ज, बेपशेमान धृष्टता से कह चुका हूँ कि मेरे लिए आज भारत में ठाकुर से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक नामदेव ढसाल जैसा युगप्रवर्तक दलित है, जिसकी कविता और संदिग्ध, बल्कि आपत्तिजनक, राजनीतिक चाल-चलन एक तीखा वाद-विवाद निर्मित तो करते हैं.
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पहले नारद पर कुछ आरोप लगाकर दबाव में लाया गया फिर प्रिंट मीडिया में छपी कुछ रिपोर्टों की परिवार के चिट्ठों पर जबरदस्त ‘ रिसाइकिलिंग ' की गई. एक बुजुर्ग चिट्ठाकार द्वारा इस ओर संकेत करने पर बड़ी निर्लज्जता और धृष्टता से उसे फिर दोहराया गया.
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कितना मुश्किल होता है ऐसे टूटने को अंदर ही अंदर जोडना, अपने को ‘वनपीस' बनाए रखना. कितना भी जगह-जगह से अपने को तरह-तरह की झूठी तसल्ली से जोड़े, दरारे तो रह ही जाती हैं जिनसे पीड़ा धृष्टता से निकल कर-कभी उसके चेहरे पर मुर्दनगी बन कर सिमट जाती है, तो कभी आँखों में नमी बन कर तैर जाती है, फिर भी घर के लोग उसे देख नहीं पाते.
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हममें से बहुत सारे लोग, जो ज़िंदगी को उसकी तरलता और सरलता के साथ जीना चाहते हैं, जो अपने बहुत सारे अभावों या बहुत सारी विफलताओं के बावजूद इस बात से खुश रहते हैं कि उन्होंने समझौते नहीं किए या किसी गर्हित मूल्यहीनता के शिकार नहीं हुए, क्या इस तरह की निर्लज्ज धृष्टता से भरी जिंदगी जीना चाहेंगे? हम जो लिखते-पढ़ते हैं, जो रचते-गुनते हैं, आखिर उसका मकसद क्या होता है?
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उनका मत जानना चाहा. उलूपी ने तुरंत पूछा, ' कोई सूचना आई, परिवार के सदस्य के रूप में सम्मलित होने का निमंत्रण मिला?. ' ' नहीं. नहीं. बस चुनौती देता अश्व, और उसके पीछे युद्ध-तत्पर योद्धा. ' ' पुत्र, नाना से भी परामर्श कर लो. ' ' नाना का भी तो उचित सम्मान नहीं किया वे इस धृष्टता से असंतुष्ट हैं. '
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कितना मुश्किल होता है ऐसे टूटने को अंदर ही अंदर जोड़ना, अपने को ‘ वनपीस ' बनाए रखना. कितना भी जगह-जगह से अपने को तरह-तरह की झूठी तसल्ली से जोड़े, दरारे तो रह ही जाती हैं जिनसे पीड़ा धृष्टता से निकल कर-कभी उसके चेहरे पर मुर्दनगी बन कर सिमट जाती है, तो कभी आँखों में नमी बन कर तैर जाती है, फिर भी घर के लोग उसे देख नहीं पाते.