युवा कवि महेशचन्द्र पुनेठा शिक्षा की स्थिति पर लगातार लिखते रहे हैं | अपने इस नए लेख में उन्होंने अन्धविश्वास से जकड़े हुए समाज में शिक्षा की आवश्यकता को रेखांकित किया है |
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अन्धविश्वास से लेकर परम शक्ति यानी ईश्वर से सम्बंधित जो सीरियल टीवी पर दिखाए जाते हैं वे हमारी सांस्कृतिक चेतना को एक ही जगह ले जाते हैं परन्तु इनमें एक बहुत बड़ा अंतर है।
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अन्धविश्वास से लेकर परम शक्ति यानी ईश्वर से सम्बंधित जो सीरियल टीवी पर दिखाए जाते हैं वे हमारी सांस्कृतिक चेतना को एक ही जगह ले जाते हैं परन्तु इनमें एक बहुत बड़ा अंतर है।
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सदियों से यूं ही निरन्तर चले आ रहे किसी भी अन्धविश्वास से मुक्ति पा जाना इतना सहज भी नहीं हैं....वातानुकूलित कमरों में बैठ कर नीतियाँ निर्धारित करने वालों के भरोसे तो बिल्कुल भी नहीं ।
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पौराणिक चरित्रों पर आधारित धारावाहिकों के प्रति बढ़ा उत्साह सकारात्मक है, पर यह बात भी दीगर है कि आस्था के नाम पर दर्शकों के सामने आडम्बर और अन्धविश्वास से जुडी सामग्री नहीं पेश की जाए।
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यह सन्योग है किसी प्रकार के अन्धविश्वास से आप ग्रसित न हो, आप में वैज्ञानिक दृष्टि का विकास हो तथा इतिहास बोध व चेतना से लैस होकर आप मनुष्य के इस जन्म को सार्थक करें.
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इस अन्धविश्वास से हमें निकल कर हमें अपने सत्य धर्म वैज्ञानिकता का पालन करना चाहिए और अपने राष्ट्र को अन्धकार से निकाल के विश्व के भले के लिए फिर से विश्वगुरु बनने कि राह पर अग्रसर होना चाहिये।
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मैंने सहायक अध्यापक को भविष्य में पुनः ऐसा न करने की राय दी, क्योंकि अध्यापक का यह कार्य बच्चों में अन्धविश्वास को बढ़ाने वाला है और विद्यालय का कार्य बालक को अन्धविश्वास से दूर करना होता है।
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मैं अपने परिवार की खुशी के लिए पूजा-पाठ में भी भाग ले लेता हूँ, और होली-दीवाली में जो आनन्द मिलता है, उसे तो भोगता ही हूँ-पर किसी भी तरह के अन्धविश्वास से दूर रहता हूँ।
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इसलिए जो भी शिक्षा-प्रणाली मन तथा मस्तिष्क को दुर्वल करे, और मनुष्य को अन्धविश्वास से भरे, जिससे वह अन्धकार में टटोलता रहे, अन्धविश्वासपूर्ण बातों की खाक छानता रहे, वह प्रणॉली उपयुक्त नहीं है, निरर्थक है।