उसके पीछे सोच ये है कि इन्टरनेट का माध्यम लिखने वाले को एक क़िस्म की क्षणिकता, अधीरता, बेतरतीबी, फ़ौरीपन, परिवर्तनशीलता और पाठक को अरझाये रखने की बेचैनी से प्रेरित रहता है।
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जीवन की क्षणभंगुरता, यौवन की क्षणिकता तथा मृत्यु की अवश्यंभाविता का बोध हो जाने पर जो मनुष्य कामासक्त होता हैं, उसकी बुद्धि को लोहे से निर्मित मानकर सर्वार्थसिद्ध वहां से भी लौट आते हैं।
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1936 के अपने एक पत्र में मैथिलीशरणजी ने प्रसाद को जो लिखा है, उससे इसकी एक झलक मिल सकती है-'मुझे अपने साहित्यिक जीवन की क्षणिकता पर न कोई आह थी न औरों की बहुकालीनता पर डाह।
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अब यह बोध कैसे बना रहे? जब हम घटनाओं की अस्थिरता और क्षणिकता के प्रति जागरूक होने लगें, संसार में हम एक दिन आए हैं और एक दिन चले जाएँगे-उस सत्य के प्रति चेतन होने लगें।
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क्षणिकता का बोध रहे तो जाने-अनजाने हो रहे कितने ही पाप करने से हम बच जायेंगे … संचय का मोह नहीं रहेगा और संचय की मंशा से किये गए समस्त तिकड़म से भी हम निजात पा जायेंगे जीवन रहते ही. … नहीं?
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भक्ति की कथा में जो लीला है, उसे ये संत क्षणिकता बोध की तरह पकड़ते हैं वे दिखाते हैं कि वर्चस्वी वर्गों की तमाम संपदा कैसे ‘पानी के बुलबुले' की तरह पर ‘परभात के तारे' की तरह जल्द ही मिट या छिप जाने वाली है.
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भक्ति की कथा में जो लीला है, उसे ये संत क्षणिकता बोध की तरह पकड़ते हैं वे दिखाते हैं कि वर्चस्वी वर्गों की तमाम संपदा कैसे ‘ पानी के बुलबुले ' की तरह पर ‘ परभात के तारे ' की तरह जल्द ही मिट या छिप जाने वाली है.
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आप जब नागार्जुन की कविता में मनुष्य की जिजीविषा और बुनियादी रोमान का हवाला देते हैं तो मेरे सरीखे पाठक के लिए वह सबकुछ इसलिए मायने रखता है कि कवि अपनी समसामयिकता और तात्कालिकता, स्थितियों-प्रसंगों की समयबध्दता, क्षणिकता, क्षणभगुंरता, क्षुद्रता और साधारणता से गुज़रते हुए ही वहां तक पहुंच रहा है।
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अज्ञेय ने क्षण के महत्त्व को स्वीकार कियो, जो क्षणिकता का निषेध करती है और यह नयी कविता की केन्द्रीय दृष्टि रही-'यह सूरज का जपा-फूल नैवेद्य चढ़ चला सागर-हाथों अम्बा सांस-भर फिर में यह पूजा-क्षण तुम को दे दूंगा क्षण अमोघ है, इतना मैंने पहले भी पहचाना है इसलिए सांस को नश्वरता से नहीं बांधता किन्तु दान भी है, अमोघ, अनिवार्य, धर्मः यह लोकालय में धीरे-धीरे जान रहा हूं (अनुभव के सोपान!) और दान वह मेरा तुम्हीं को है।
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वह देख लेती है आपके पहने हुए कपड़ों आपके ओढ़े हुए माँस की कुम्हलाई क्षणिकता के आर-पार और आपके दिल की जर्द धड़कती परछाई के इर्द-गिर्द की भुतहा हड्डियों तक और अब उसने जाना कि दिन के चौबीसों घंटे हफ़्ते के सातों दिन वह देखने लगी है इसी तरह काम के तनाव को लेकर बहुत परेशान रहने लगी है परेशान कि कहीं वह पागल न हो जाये वह इसे ऑफ कर देना चाहती है पर नहीं कर पाती कोड हमेशा रेड होता है और दुश्मन हर तरफ.