यदि ऐसा है भी तो भी क्या इस खगोलीय सर्वात्मा के अनन्तर जिज्ञासाओं और अनुसंधानों का कोई ऐसा मैदान है जो कला, कलाकार और सौंदर्यशास्त्रीय मूल्यों के बारे में विचारों की बुनावट को जेंडर के प्रभावों के मद्देनज़र आकलित करता है या कर सकता है?
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अस्पष्टताएं या तो सौंदर्यशास्त्रीय कारणों से उत्पन्न होती हैं (उदाहरण के लिए यह विचार कि केवल “मनभावन” अन्विति ही सुरीला हो सकती है) या “हॉर्मोनिक” (एक साथ ध्वनित होते हुए पीच) और कॉन्ट्रापुंटल (सफलता पूर्वक ध्वनित होते स्वर) के बीच फर्क बताते हुए संगीत की बुनावट के विचार के कारण.
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अस्पष्टताएं या तो सौंदर्यशास्त्रीय कारणों से उत्पन्न होती हैं (उदाहरण के लिए यह विचार कि केवल “मनभावन” अन्विति ही सुरीला हो सकती है) या “हॉर्मोनिक” (एक साथ ध्वनित होते हुए पीच) और कॉन्ट्रापुंटल (सफलता पूर्वक ध्वनित होते स्वर) के बीच फर्क बताते हुए संगीत की बुनावट के विचार के कारण.
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हाँ, उन लोगों ने हिंदी-मानस जरुर रचा है, समालोचना के समुचित विकास के लिए यह जरुरी है कि अपनी परंपरा को न सिर्फ़ समझा जाय, वरन उसे अपने संस्कृति-सूत्र से जोड़कर उससे सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन की ऐसी अवधारणा विकसित की जाय जो साहित्य और जन की समृद्धि के काम आ सके।
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तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौंदर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अधःपतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं।
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तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौंदर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अधः पतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं।
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तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौंदर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अधः पतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं।
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उन्होंने लिखा है कि `बीसवीं सदी के पैमाने पर, निर्वासन की घटनाओं को न तो सौंदर्यशास्त्रीय तरीक़े से और न ही मानवतावादी नज़रिये से ठीक से समझा जा सकता है, निर्वासन के बारे में रचा गया साहित्य तो सिर्फ़ उस दर्द और नियति को एक वस्तु में बदल भर देता है जिस दर्द से हो कर ज़्यादातर लोग खुद नहीं गुज़रे हैं।
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उन्होंने लिखा है कि ` बीसवीं सदी के पैमाने पर, निर्वासन की घटनाओं को न तो सौंदर्यशास्त्रीय तरीक़े से और न ही मानवतावादी नज़रिये से ठीक से समझा जा सकता है, निर्वासन के बारे में रचा गया साहित्य तो सिर्फ़ उस दर्द और नियति को एक वस्तु में बदल भर देता है जिस दर्द से हो कर ज़्यादातर लोग खुद नहीं गुज़रे हैं।
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इसके पहले कि हम रिल्के की इस स्थापना पर सौंदर्यशास्त्रीय मिजाज से विचार करें, हमें कविता परिधि में साहित्य के उस समाजशास्त्रीय-अवलोकन की जरूरत शिद्दत से महसूस हो रही है, जो कथ्य के प्रतिपाद्य सत्य और उसके आद्य-अतीत की लम्बी काल सर्जित रेखा पर संतुलन साधना सिखाता है, यद्यपि यह साहित्य की नहीं, विशुद्ध रूप से समाज की जरूरत का मामला है....