अन्तराय कर्म के 5 भेद हैं-जिस कर्म के उदय से दान देते हुए जीव के विघ्न होता है वह दानान्तराय कर्म है।
12.
गोत्रकर्म के अभाव में आत्मा का अनुरुलघुत्व गुण प्रकट होता है तथा अन्तराय के अभाव में अनन्तवीर्य आदि 5 क्षायिकलब्धि भी प्रकट होती है।
13.
हमारे सामने ेजितने उपाय हैं, जितनी अविद्या हैं, जितने अन्तराय हैं, उन्हें शान्त करने के लिए उतने उपाय मिल जाएं तो बहुत बड़ी बात होती है।
14.
अगर पारस के श्पर्श से लोहा सोना नहीं बनता तो या तो असली पारस नहीं या तो लोहे ओर पारस के बीच में कोई अन्तराय हैं ।
15.
मोहनीय, ज्ञानवरण, दर्शनावरण और अन्तराय एन चार घातिया कर्मों का क्षय हो गया वह आत्मा वीतराग, ' जिन ', सर्वज्ञ या केवली कहलाता है
16.
श्रीं के जाप से मुख्या रूप से हमारे अन्तराय कर्म का नाश होता है व्यापारिक अडचनों व आर्थिक समस्याओं को समाप्त करके आय के नए स्तोत्र खुलते हैं!
17.
ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय वेदनीय मोहनीय आयुकर्म नामकर्म गोत्रकर्म अन्तराय कर्म मोक्षप्राप्ति के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्मफल का नाश करे और इस जन्म में किसी प्रकार का कर्मफल संग्रहीत न करे।
18.
है यदि ज्ञान तो अज्ञान भी दर्शन है यदि तो अदर्शन भी है सुख तो दुःख भी मूर्छा है तो जागरण भी है यदि जीवन तो मृत्यु भी शुभ है तो अशुभ भी है उच्च तो निम्न भी अन्तराय है तो निरन्तराय भी....
19.
-हरीश प्रकाश गुप्त नव वर्ष की शुभ्र ज्योत्सना, द्युतिमय कर दे जीवन को अजस्र उत्स सी बहे अहर्निश वैभव, सुख, खुशियाँ भरने को, अदिति-विवस्वत की छाया में आगत ने अवसान कर दिया विगत वर्ष का, अन्तराय का गहन विवर में, शून्य विजन में, नव वसंत की नूपुर ध्वनि-सी स्मृतियाँ अवशेष रह गईं मधुरिम-मधुरिम, सुखद सलोनी मन आंगन के कोमल थल में, अखिल शून्य के तारों के संग दिन-ऋतु-प्रकृति मुक्त हँस खेली जन-मन को अभिसिंचित करने चहुँदिश में समृद्धि बिखेरी ।